दो दशकों में पूरी तरह से बदल गई दादरा नगर हवेली की राजनीतिक स्थिति - Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli
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  • दो दशकों में पूरी तरह से बदल गई दादरा नगर हवेली की राजनीतिक स्थिति
    - कभी व्यक्तिगत राजनीति का अचूक उदाहरण रहा दादरा नगर हवेली अब उम्मीदवारों के लिए राजनीतिक पार्टी ही बन रही है जीत का आधार
    (असली आजादी न्यूज नेटवर्क) सिलवासा, 23 मार्च। संघ प्रदेश दादरा नगर हवेली जब भारतीय गणराज्य में 1961 में शामिल हुआ था तभी से यहां पर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कायम की गई थी। एक लोकसभा सीट वाले दादरा नगर हवेली में राजनीतिक इतिहास बहुत ही अलग रहा है। क्योंकि दादरा नगर हवेली में कभी भी राजनीतिक पार्टियों का वर्चस्व नहीं रहा और यहां पर व्यक्तिगत आचरण और जनता के बीच पहुंच ही उम्मीदवार के जीत का माध्यम हुआ करता था। लेकिन दो दशकों में दादरा नगर हवेली में भी राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह से बदल गई है। अब दादरा नगर हवेली में व्यक्तिगत आचरण और जनता के बीच पहुंच वाले उम्मीदवारों के जीत की संभावना धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है और पार्टी आधारित जीत सुनिश्चित होने लगी है। दादरा नगर हवेली में पिछले दो दशकों में इतना बड़ा बदलाव कहां से आया यह एक मंथन का विषय है और भले ही राजनीतिक पार्टियां अपने एजेंडे को आगे कर अपने उम्मीदवारों का जीत सुनिश्चित कर रही हैं लेकिन कहीं ना कहीं इसका समुचित लाभ स्थानीय आधारित लोगों को नहीं मिल रहा है। राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो दादरा नगर हवेली में 1989 के समय स्थानीय आदिवासी युवकों में जो राजनीतिक बदलाव का उत्साह और जोर दिखाई देता था वह समय के साथ धीरे-धीरे खत्म होता गया। दादरा नगर हवेली में वर्तमान समय में मतदाताओं की संख्या 250000 के करीब पहुंच गई है, जिसमें सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या स्थानीय आदिवासी मतदाताओं की संख्या के लगभग बराबर सी हो गई है। ऐसे में जब मतदाताओं की संख्या सामान्य वर्ग और स्थानीय आदिवासी वर्ग की संख्या के बराबर है तो मुद्दे भी अपने आप बदल से गए। 1989 के समय जो मुद्दे प्रेरक और प्रायोगिक थे वह आज के समय में सार्थक नहीं रहे, जिसका परिणाम यह निकल रहा है कि कहीं ना कहीं स्थानीय मुद्दों से बढ़कर केंद्रीय और देश के मुद्दे बड़े होते जा रहे हैं जिसके कारण अब व्यक्तिगत राजनीति के लिए जगह छोटी पड़ती जा रही है। अगर इन समीकरणों को देखा जाए तो दादरा नगर हवेली में जो बदलाव मतदाताओं की संख्या के बढ़ने के कारण आए हैं उन बदलावों की समीक्षा के बगैर कोई भी उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरने की भूल नहीं कर सकता है और अगर ऐसा होता है तो परिणाम उम्मीदों से परे भी होंगे।
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