आज भी संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर है दादरा नगर हवेली से सटे गुजरात और महाराष्ट्र के गांव की आदिवासी महिलाएं - Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli
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  • आज भी संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर है दादरा नगर हवेली से सटे गुजरात और महाराष्ट्र के गांव की आदिवासी महिलाएं
    असली आजादी ब्यूरो, सिलवासा, 08 दिसंबर। संघ प्रदेश दादरा नगर हवेली में बुनियादी विकास की समीक्षा की जाय तो अन्य राज्यों के मुकाबले बहुत बेहतर स्थिति में पाया जाएगा। बुनियादी विकास की तुलनात्मक व्यवस्था जानने के लिए दादरा नगर हवेली की आदिवासी विस्तार वाले गांवों के बगल में ही स्थित गुजरात और महाराष्ट्र राज्य के लगने वाले गांवों का अध्ययन किया जाए तो जमीन आसमान का अंतर दिखाई देता है। पिछले चार सालों में बुनियादी विकास में जो कसर बाकी थी प्रधानमंत्री उज्जवला योजना और अन्य योजनाओं के माध्यम से पूरी की गई है। जिससे दादरा नगर हवेली की गांव में रहने वाले आम व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार हुआ है। लेकिन वहीं नजर गुजरात राज्य के कपराडा तहसील के दादरा नगर हवेली से लगने वाले गांवों के लोगों का जीवन स्तर देखा जाए तो आज भी इन गांवों की आदिवासी महिलाओं, व्यक्तियों का जीवन उतना ही संघर्षपूर्ण है जितना देश की आजादी के समय था। विकास की तुलनात्मक रुपरेखा को समझने के लिए असली आजादी के संवाददाता ने कपराडा तहसील में आने वाले कुछ गांव का दौरा किया तो वहां विकास की एक अलग स्थिति देखने को मिली। आदिवासी महिलाएं आज भी जंगल में जाती है और जंगल की सूखी लकडि़यां एकत्रित करती हैं फिर उसे अपने सिर पर रखकर कई किलोमीटर पैदल चलकर घर तक पहुंचती है। इन लकडि़यों का वजन उठाने वाली आदिवासी महिलाओं के वजन में बड़ा फर्क होता है। महिलाओं का वजन 40 से 50 किलो होगा तो उनके सिर पर रखा हुआ लकडि़यों का वजन 60 से 70 किलो से अधिक होता है। इतना वज़न रखकर उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर तक पहुंचना होता है, जिसे इतनी बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं को सर पर सुखी लकडि़यों का गठन लेकर जाते हुए देखा गया। महिलाओं से बात करने पर उन्होंने बताया कि यह लकडि़यां उन्हें खाना बनाने के काम आएगी। यदि लकडि़यां इकट्ठा करके नहीं रखें तो उन्हें खाना बनाने के लिए लकडि़यां पर्याप्त रूप में नहीं मिल पाती है जिसके लिए उन्हें कई दिनों तक जंगलों में जाकर लकडि़यों को इकट्ठा करना पड़ता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार ने उन्हें गैस सिलेंडर अथवा सोलर कुकर नहीं दिया है? उन्होंने कहा कि आज तक हमें गैस सिलेंडर मिला ही नहीं है और सोलर कुकर क्या होता है हमें पता ही नहीं है। एक तरफ दादरा नगर हवेली के कई गांव है जहां हर घर में डिश टीवी, घरों के बाहर गाडि़यां तथा घरों के अंदर गैस सिलेंडर दिखाई देते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ उससे लगने वाले गांव जो गुजरात एवं महाराष्ट्र में आता है उस गांव की यह स्थिति दर्शाती है कि विकास के मायने दूरियां बढ़ने के साथ ही बदल जाते हैं।
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